हम सभी अपनी लाइफ में ऐसी स्थिति से गुज़रते हैं, जहाँ हम तय करते हैं कि एक हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनाएंगे हेल्दी खाना खाएंगे, एक्टिव रहेंगे, अच्छी नींद लेंगे या तनाव को कम करेंगे। हम एक पक्का प्लान बनाते हैं। कुछ दिनों तक उस पर अमल भी करते हैं। लेकिन फिर पुरानी आदतें वापस लौट आती हैं और मोटिवेशन कम होने लगता है। सिर्फ़ सेहत के मामले में ही नहीं, बल्कि काम और ज़िंदगी के मामलों में भी। यही पुरानी आदतें हमारा कम्फर्ट ज़ोन बन गईं हैं।
‘कम्फर्ट ज़ोन’ एक ऐसी स्थिति है जहाँ हम सहज, सुरक्षित, नियंत्रित और जानी-पहचानी चीज़ों के बीच होते हैं। इसी जोन में हमारी आदतें होती हैं, रूटीन अपने-आप (ऑटोपायलट पर) चलते हैं, और दिमाग को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।
बिहेवियरल साइंस में कम्फर्ट ज़ोन का मतलब सिर्फ़ आरामदायक नहीं, बल्कि चीज़ों का पहले से पता होना है। दिमाग का काम हमें सुरक्षित रखना और ऊर्जा बचाना है। इसलिए हमारा दिमाग उस रूटीन को पसंद करता है जिन्हें वह जानता है, भले ही वे हमेशा फ़ायदेमंद या सेहत के लिए अच्छे न हों।
कम्फर्ट ज़ोन उसे कहेंगे जहाँ आप बिना किसी घबराहट के अपने काम और ज़िंदगी के 90% या उससे ज़्यादा काम संभाल सकते हैं। यह काफ़ी आरामदायक होता है। इसमें सब कुछ आपकी पहुँच में होता है और आपको कुछ भी करने के लिए खुद पर ज़बरदस्ती नहीं करनी पड़ती। यह एहसास वाकई बहुत अच्छा होता है, लेकिन आपकी तरक्की हमेशा मुश्किलों भरी होती है। इसके लिए आपको हिम्मत जुटानी होती है, चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, अकेलेपन से निपटना होता है, और साथ ही नामुमकिन लगने वाले कामों को पूरा करने के लिए पूरी कोशिश करनी पड़ती है।
हम कम्फर्ट जोन में क्यों रहना चाहते हैं?
हम कम्फर्ट ज़ोन में इसलिए रहना चाहते हैं क्योंकि बदलाव दिमाग को एक खतरे जैसा लगता है। हमारा नर्वस सिस्टम इस अनिश्चितता को तनाव के तौर पर देखता है। दिमाग असली खतरे और महसूस होने वाली बेचैनी के बीच फ़र्क नहीं करता, वह बस जानी-पहचानी चीज़ों से हटकर कुछ अलग होने को भांप लेता है।
इसीलिए लोग अक्सर व्यवहार में बदलाव को मुश्किल या तनावपूर्ण कहते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि आपमें इच्छाशक्ति की कमी है, बल्कि इसलिए है क्योंकि शरीर और दिमाग ऐसी चीज़ों का विरोध करते हैं, जो हमारे लिए नया है।
लेकिन इस कम्फर्ट जोन से रातों-रात बाहर नहीं आया जा सकता। बदलाव छोटे-छोटे और लगातार उठाये गए कदमों से आता है। अगर अभी चीज़ें थोड़ी असहज लग रही हैं, तो इसे इस बात का संकेत समझें कि आप सही रास्ते पर हैं।
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना क्यों जरूरी है
वैसे तो कम्फर्ट ज़ोन में रहने के कई फ़ायदे भी हैं जैसे कम तनाव और आरामदायक महसूस करना। लेकिन इससे ऐसा भी लग सकता है कि आप एक ही जगह पर अटक गएँ हैं, लेकिन आगे बढ़ना भी इंसानी जरूरत है। आगे बढ़ने, प्रोडक्टिविटी बढ़ाने और नए अनुभव पाने के लिए इस कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना ही पड़ेगा।
नियमित और सकारात्मक तरीके से अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने की क्षमता निश्चितता और अनिश्चितता के बीच सही संतुलन बनाने में मदद करती है। अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने से आप ज़्यादा प्रोडक्टिव, हालात के अनुसार ढलने वाले और क्रिएटिव बन सकते हैं। जब आप अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़ते हैं, तो आप अपने दिमाग को नई स्थितियों के अनुकूल ढलने के लिए तैयार करते हैं।
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर कैसे निकलें
कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने के लिए, नई चीज़ें अपनाते वक्त होने वाले डर और घबराहट पर काबू पाना सीखना होगा। शुरुआत अपनी भावनाओं को समझने और अपनी सोच को बदलने से होगी।
1. अपनी बेसलाइन को जाने
अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने के लिए यह तय करना होगा कि आप कितना रिस्क ले सकते हैं। ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि वे वास्तव में जितना रिस्क ले रहे हैं, उससे कहीं अधिक ले सकते हैं और कई लोगों को अपनी रिस्क लेने की क्षमता का पता ही नहीं होता क्योंकि उन्हें कभी ऐसी मुश्किल स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा जहाँ उनकी परीक्षा हुई हो। अपना बेसलाइन पता करने के लिए अपनी मुख्य प्रेरणा को पहचानें। अगर आपकी सबसे अहम निश्चितता है, तो हो सकता है कि आपको दूसरों के मुकाबले अपने कम्फर्ट ज़ोन से ज़्यादा बाहर निकलना पड़े।
2. अपनी भावनाओं पर काबू पाना सीखें
जो लोग आसानी से अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकल पाते हैं, उनमें अपनी भावनाओं पर काबू रखने की क्षमता उन लोगों से ज़्यादा होती है जो अपनी रोज़मर्रा की आदतों में ही फंसे रहते हैं। वे मानते हैं कि उनकी भावनाएं उन्हें रास्ता दिखाने के लिए होती हैं। जब आप अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलते हैं, तो घबराहट होना सामान्य बात है। यह बताता है कि आप कमज़ोर या असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसे स्वीकार करें और फिर इससे आगे बढ़ें।
3. सोचने का नज़रिया बदलें
मुझे बदलना है के बजाय सोचें – मैं अपना ख्याल रखने का एक नया तरीका सीख रहा या रही हूँ। हो सकता है यह मेरे लिए नया हो, लेकिन नामुमकिन नहीं है।
चीज़ों को परखने या जज करने के बजाय उनके प्रति जिज्ञासा रखने से, बिना दिमाग के खतरे वाले रिस्पॉन्स’ (threat response) को सक्रिय किए, किसी काम में पूरी तरह से जुड़ा जा सकता है।
4. विकास करने की सोच अपनायें
आगे बढ़ने के लिए विकास इंसान के लिए सबसे ज़रूरी है। अगर आप आगे नहीं बढ़ रहे हैं, तो आप पिछड़ जाएंगे। सफल लोगों में आगे बढ़ने की गहरी चाहत होती है, जो उन्हें नई चीज़ों की तलाश में अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करती है। इसे ही ग्रोथ माइंडसेट कहा जाता है , यह विश्वास कि अपनी स्किल्स को बेहतर बनाया जा सकता है। सीमित सोच वाले लोग यह नहीं मानते कि वे खुद को बेहतर बना सकते हैं, और शायद वे कोशिश भी नहीं करना चाहते। जब आप ग्रोथ माइंडसेट विकसित करते हैं, तो आप अपनी अंदरूनी शक्ति को जगा पाते हैं।
5. अपने जैसी सोच वाले लोगों का साथ चुने
अगर आप अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना चाहते हैं, तो आपको सही लोगों के साथ रहना चाहिए। ऐसे लोग जिनकी सोच आगे बढ़ने की हो। ऐसे लोग जो रोज़ाना खुद को बेहतर बनाने और बेहतर काम करने की चुनौती लेते हों। ऐसे लोग जो आपकी कामयाबियों पर खुश हों और नाकामियों से सीखने में आपकी मदद करें। ये कोई मेंटर या सपोर्ट करने वाले दोस्त हो सकतें है। जब आप सही साथ की ताकत का सही इस्तेमाल करना सीख जाते हैं, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है।
6. शुरुआत में छोटे छोटे कदम उठायें
आपको तुरंत ही कोई बड़ा कदम उठाने की ज़रूरत नहीं है। छोटी शुरुआत करें। जैसे की कंपनी में कोई छोटी-सी घोषणा करें। काम पर जाने के लिए कोई नया रास्ता अपनाएँ। किसी नए रेस्टोरेंट में जाएँ। ऐसी नई आदतें बनाना शुरू करें जिनसे कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने की आपकी क्षमता स्वाभाविक लगे और आपकी रोज़मर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन जाए।
7. असफलता से डरे नहीं बल्कि उससे सीखें
असफलता का डर आगे बढ़ने से रोकता है। अगर आप सफल एथलीटों, बिज़नेस करने वालों और एक्टर्स को देखते हैं, तो आप पाएंगे कि उनमें एक बात कॉमन है, वे सभी अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी बुरी तरह फेल हुए हैं। फ़र्क यह है कि वे असफलता से डरें नहीं बल्कि उन्होंने उससे सीखा है, लेकिन उसे खोजने के लिए अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना होगा।
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