स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताने के दुष्प्रभाव 

आजकल छोटे बच्चे, किशोर, व्यस्क और बुजुर्ग हर पीढ़ी स्मार्टफोन, टैबलेट या कंप्यूटर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रही है। सीमित मात्रा में अपने काम के लिए प्रयोग करना तो ठीक है, पर समस्या तब होती है, जब जरूरत से ज्यादा इसका प्रयोग किया जाता है या जब लोग इसके आदि बन जाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि बहुत अधिक स्क्रीन टाइम सभी पर बुरा प्रभाव डालता है। जहाँ कुछ स्मार्ट डिवाइस बच्चों की शिक्षा को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं, वहीं स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताना हानिकारक हो सकता है।

अनुसंधान से पता चलता है कि ज्यादा स्क्रीन समय मस्तिष्क के विकास में बाधा डाल सकता है और स्वास्थ्य सम्बन्धी कई परेशानियों का कारण बन सकता है।

स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताने से बच्चों में कई समस्याएं पैदा हो रहीं है। कई बच्चे अति सक्रियता के कारण नींद की कमी से पीड़ित होते जा रहे हैं। कुछ बच्चे अक्सर अपनी मनमर्जी करते हैं, मूडी हो जाते हैं और कक्षा में या घर पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।

स्क्रीन टाइम युवाओं में भी जिनका मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा है, नुकसान का कारण बन सकता है। यह बच्चों की सहानुभूति और करुणा दिखाने की क्षमता को प्रभावित करता है। इससे बच्चों में हिंसक व्यवहार बढ़ सकता है। 

बहुत अधिक स्क्रीन समय मस्तिष्क की संरचना और कार्य को प्रभावित करता है, यह मोटापा, अनिद्रा, मूड स्विंग्स इत्यादि का कारण बन सकता है। बच्चों के दिमाग में उनके प्रारंभिक वर्षों के दौरान बहुत अधिक परिवर्तन होते हैं, उनके लिए ज्यादा स्क्रीन समय और भी अधिक हानिकारक हो सकता है। अत्यधिक स्क्रीन समय से अकादमिक सफलता और सामाजिक कौशल नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। इस वजह से बच्चों द्वारा डिवाइसिस के प्रयोग किये जाने पर निगरानी रखना जरूरी है। बच्चे स्क्रीन पर कितना समय बिता सकते हैं, इसकी सीमा तय करना अच्छी शुरुआत है।

स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने के परिणाम

1. नींद की कमी

स्क्रीन पर बिताये गए समय की मात्रा का सीधा प्रभाव नींद पर पड़ता है, डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी शरीर में स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन में रूकावट करती है। यही कारण है कि सोने से ठीक पहले डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने से सोना मुश्किल हो जाता है।

2. मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

अत्यधिक स्क्रीन टाइम के सबसे चिंताजनक परिणामों में से एक इसका मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव है। एकाग्रता में कमी आती है, याददाश्त कमजोर हो सकती है, जानकारी को ग्रहण करने की गति धीमी हो जाती है – ये प्रभाव विशेष रूप से बच्चों के लिए चिंताजनक हैं, जिनके दिमाग अभी विकसित हो रहे हैं।

 3. आंखों पर प्रभाव

लंबे समय तक स्क्रीन पर देखने से आंखों पर बुरा असर पड़ता  है। अत्यधिक समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, सिरदर्द ,ड्राई आईज हो सकतीं हैं, इससे रेटिना को भी नुकसान हो सकता है और ऑंखें कमजोर हो सकती है। इसके अलावा लगातार झुककर फोन को देखने से गर्दन और कंधे दोनों में अकड़न और दर्द महसूस हो सकता है।

4. मोटापे और उनसे जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है

डिजिटल डिवाइस के उपयोग का मतलब है, आप शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे हैं। यह वजन बढ़ाने में योगदान देता है, खासकर यदि आप लंबे समय तक बैठकर टीवी देखते हैं। हर दिन केवल दो घंटे लगातार टीवी देखने से मोटे होने का खतरा काफी बढ़ सकता है।

मोटापे का जोखिम टाइप 2 डाइबिटीस, हृदय रोग जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हुए लंबे समय तक बैठे रहने से इंसुलिन और ब्लड शुगर के स्तर में वृद्धि हो सकती है और रक्तप्रवाह में फैट का जमाव भी हो सकता है। स्क्रीन पर कम समय और शारीरिक रूप से सक्रिय रहने से निश्चित रूप से इन समस्याओं से बचने में मदद मिल सकती है।

5. सामाजीकरण की कमी   

डिजिटल उपकरणों का उपयोग अक्सर लोग एकान्त में बैठकर करते हैं। स्क्रीन पर क्या हो रहा है, उसे देखने में व्यस्त रहते हैं, इस वजह से वास्तविक जीवन में बहुत अधिक बातचीत नहीं होती है। इससे सामाजीकरण में कमी आती है, लोग डिवाइसेस के साथ अपने में ही व्यस्त रहते हैं। विशेष रूप से बच्चों में ऐसा होने से उनका दोस्तों के साथ खेलने के माध्यम से महत्वपूर्ण सामाजिक कौशल विकसित करने का यह अवसर तब खो जाता है, जब वे इसके बजाय डिजिटल डिवाइसेस पर समय बिताते हैं।

6.भावनाओं और व्यक्तित्व पर प्रभाव 

बहुत अधिक स्क्रीन समय भावनाओं को समझने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। वैज्ञानिक शोध के अनुसार, हिंसक मीडिया सामग्री के संपर्क में आने से भी आक्रामकता का स्तर बढ़ सकता है, खासकर छोटे बच्चों और किशोरों में।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जो बच्चे कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन के सामने दिन में दो घंटे से अधिक समय बिताते हैं, उनमें मानक प्रश्नावली (standard questionnaire ) पर मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों की संभावना अधिक थी। युवा पुरुषों के अध्ययन से पता चलता है कि हिंसक वीडियो गेम खेलना अधिक आक्रामकता और दूसरों के प्रति कम संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, इमेजिंग अध्ययनों में पाया गया है कि इंटरनेट की लत और खेल की लत मस्तिष्क के उन क्षेत्रों को कम कर सकती है, जो योजना और निर्णय की क्षमता, सहानुभूति, करुणा और इच्छाओं के नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि मस्तिष्क कितनी जल्दी या आसानी से सामान्य स्थिति में लौटता है।

7. छोटे बच्चों में सीखने की क्षमता में कमी 

छोटे बच्चों में स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने के कारण मस्तिष्क की संरचना में परिवर्तन होता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से,अधिक टीवी देखने वाले बच्चों को भाषा सीखने में अधिक कठिनाई होती है। बच्चों को शैक्षिक कार्यक्रम देखने देना उन्हें शिक्षित करने का सबसे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है – छोटे बच्चे दूसरों द्वारा व्यक्तिगत रूप से सिखाये जाने पर बेहतर सीखते हैं, उन्हें निष्क्रिय रूप से शो देखने देना उनके दिमाग को सक्रिय होने से रोकता है। किशोरों में डिजिटल मीडिया का उपयोग नशे जैसा प्रभाव पैदा कर सकता है, जब माता-पिता अचानक उनसे डिवाइस ले लेते हैं, तो आमतौर पर उनमे काफी उदासीनता आ जाती है। 

शोध से पता चलता है कि बच्चों द्वारा स्क्रीन (फ़ोन ,टी वी,कंप्यूटर ,टेबलेट इत्यादि ) पर बहुत अधिक समय बिताने से कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। 

1. मोटापा –  बच्चे आलसी होकर स्क्रीन को देखते रहते हैं, तो वे कैलोरी बर्न नहीं कर रहे होते हैं। इस गतिहीन जीवन शैली के कारण उनका वजन बढ़ सकता है।

2, नींद में गड़बड़ी – सोने से पहले स्क्रीन देखने से नींद के चक्र में रूकावट आ सकती है। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मस्तिष्क के नींद चक्र में बाधा डालती है और अनिद्रा का कारण बन सकती है।

3. मनमर्जी करना  या अन्य व्यवहार संबंधी समस्याएं – जो बच्चे प्रतिदिन दो घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं, उनमे अक्सर ध्यान लगाने में कमी की समस्या होती है।

4. शैक्षणिक समस्याएं – जो बच्चे अपनी स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताते हैं, उन्हें भी अकादमिक परीक्षण में खराब प्रदर्शन करते हुए दिखाया गया है।

5. हिंसा की प्रवृत्ति – जो बच्चे हिंसक मीडिया, जैसे कि फिल्में, संगीत और वीडियो गेम के संपर्क में आते हैं, वे हिंसा के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। वे टीवी पर जो देखते हैं उसकी नकल करने की कोशिश कर सकते हैं या अपनी समस्याओं को हल करने के लिए हिंसा का उपयोग करने का प्रयास भी कर सकते हैं।

कुछ उपायों को अपनाकर नकारात्मक दुष्प्रभावों को थोड़ा कम किया जा सकता है।

1. फ़िज़ूल और मनमाने ढंग से स्क्रीन पर समय बिताने से बचें। कुछ अनुशासन अपनाएं, स्क्रीन चैक करने की समय सीमा तय करें।   

2. पर्यावरणीय कारकों पर ध्यान दें। जिस जगह पर स्क्रीन देख रहें हैं, वहाँ पर्याप्त रोशनी का ध्यान रखें, गर्दन या शरीर की मुद्रा को ठीक रखें और सोने से पहले स्क्रीन का उपयोग सीमित करें। 

3. नियमित रूप से आँखों के लिए और शरीर की मूवमेंट के लिए ब्रेक लें। यदि काम के लिए आप लंबे समय तक कंप्यूटर या स्मार्टफोन पर समय व्यतीत करते हैं, तो सुनिश्चित करें कि आप कुछ अंतराल के बाद बार-बार आँखे बंद करके उन्हें आराम दें और टहलकर शरीर की मूवमेंट भी करते रहें। 

यदि आपकी आँखें लाइट के प्रति संवेदनशील हैं, तो सुरक्षात्मक ब्लू लाइट चश्मा, स्क्रीन लाइट फिल्टर और ऐप्स और स्क्रीन एक्सपोजर की कम मात्रा लक्षणों के विकास के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते है।

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About the Author: Kusum Kaushal

कुसुम कौशल ने उत्तराखंड में स्थित विश्वविद्यालय (हेमवती नंदन बहुगुणा यूनिवर्सिटी) से इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। हिंदी उनकी मूल भाषा है।

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